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Braj Bhoomi
ब्रज

श्रीराधा-कृष्ण की लीलाओं, भक्ति और संस्कृति की जीवंत विरासत

ब्रज केवल एक स्थान नहीं - यह श्रीराधा-कृष्ण की लीलाओं, प्रेम-भक्ति, संगीत, लोक-संस्कृति और सदियों पुरानी आध्यात्मिक परम्पराओं से जुड़ी एक जीवंत विरासत है।

मथुरा, वृंदावन, गोवर्धन, बरसाना, नंदगाँव, गोकुल, राधाकुंड और श्यामकुंड सहित ब्रज के अनेक क्षेत्र अपनी विशिष्ट आध्यात्मिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान रखते हैं।

Braj Darshan का उद्देश्य

केवल स्थानों तक पहुँचना नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी कथाओं, लीलाओं, परम्पराओं, लोकजीवन और आध्यात्मिक महत्व को जानना और अनुभव करना है।

ब्रज के प्रमुख आध्यात्मिक क्षेत्र

जहाँ हर कण में श्रीराधा-कृष्ण की लीला बसी है

मथुरा

श्रीकृष्ण की जन्मभूमि के रूप में प्रसिद्ध प्रमुख आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्र।

वृंदावन

श्रीराधा-कृष्ण भक्ति, भजन, संकीर्तन और समृद्ध आध्यात्मिक परम्पराओं से जुड़ा प्रमुख क्षेत्र।

गोवर्धन

श्रीकृष्ण की गोवर्धन-लीला और परिक्रमा परम्परा से जुड़ा पावन क्षेत्र।

बरसाना

श्रीराधारानी की भक्ति तथा ब्रज की लोक एवं सांस्कृतिक परम्पराओं से जुड़ा क्षेत्र।

नंदगाँव

नंदबाबा और श्रीकृष्ण के बाल्यकाल की लीलाओं से जुड़ा क्षेत्र।

गोकुल

श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ी भक्ति परम्पराओं का महत्वपूर्ण क्षेत्र।

राधाकुंड एवं श्यामकुंड

श्रीराधा-कृष्ण भक्ति परम्परा में विशेष आध्यात्मिक महत्व रखने वाले पवित्र स्थल।

ब्रज की परिक्रमा

चलना भी साधना • यात्रा भी स्मरण

गोवर्धन परिक्रमा, वृंदावन की परिक्रमा तथा अन्य स्थानीय परिक्रमा परम्पराएँ ब्रज की आध्यात्मिक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

ब्रज की जीवंत संस्कृति

ब्रजभाषा रसिया लोकगीत लोकनृत्य भजन हरिनाम संकीर्तन रासलीला झूलन होली उत्सव

ब्रज की पहचान उसकी भाषा, संगीत, लोककला, उत्सवों और सदियों पुरानी भक्ति परम्पराओं में भी जीवित है।

Braj Darshan का अनुभव

लीला एवं कथा
आध्यात्मिक विरासत
परिक्रमा
भक्ति एवं संकीर्तन
लोक संस्कृति
स्थानीय अनुभव

ब्रज को केवल देखिए नहीं – जानिए, सुनिए, समझिए और अनुभव कीजिए।

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ब्रज धाम

व्रज समुद्र मथुरा कमल, वृन्दावन मकरंद ।
व्रजवनिता सब पुष्प हैं, मधुकर गोकुलचंद ॥

निखिल विश्व की आत्मा श्री कृष्ण चराचर प्रकृति के एक मात्र अधीश्वर हैं, समस्त क्रियाओं के कर्ता, भोक्ता और साक्षी भी हैं। वही सर्वव्यापक हैं, अन्तर्यामी हैं। सच्चिदानन्द श्री कृष्ण जी का निज धाम, उनकी बाल लीलाओं का साक्षी एवं उनकी प्रियतमा श्री राधारानी का हृदय है बज धाम।

भारत वर्ष में अनेक तीर्थ स्थल जैसे अयोध्या, द्वारिका, चित्रकूट, चार धाम आदि अवस्थित हैं। इन्हीं सब धामों में व्रज मण्डल अपना अनूठा महत्व रखता है।

भक्ति रस में व्रज रस की माधुरी अनुपमेय है। भगवान श्री कृष्ण ने व्रज में प्रकट होकर रस की जो मधुरतम धारा प्रवाहित की उसकी समस्त विश्व में कोई तुलना नहीं है। बड़े-बड़े ज्ञानी, योगी, ऋषि मुनि, देवगण सहस्त्र वर्ष प्रभु के दर्शन पाने को तप करते हैं फिर भी वो प्रभु का दर्शन प्राप्त नहीं कर पाते हैं वहीं इस ब्रज की पावन भूमि में परम सच्चिदानन्द श्री कृष्ण सहज ही सुलभ हो जाते हैं।

समस्त ब्रज मण्डल को रसिक संतजनों ने वैकुण्ठ से भी सर्वोपरि माना है। इससे ऊपर और कोई भी धाम नहीं है जहाँ प्रभु ने अवतार लेकर अपनी दिव्य लीलायें की हों। इस व्रज भूमि में नित्य लीला शेखर श्रीकृष्णजी की बांसुरी के ही स्वर सुनाई देते हैं अन्य कोलाहल नहीं। यहाँ तो नेत्र और श्रवणेन्द्रियाँ प्रभु की दिव्य लीलाओं का दर्शन और श्रवण करते हैं।

ब्रज की नित्य लीलाएं

पक्षियों का चहकना, वायु से लताओं का हिलना

मोर बंदरों का वृक्षों पर कूदना

यमुना के प्रवाहित होने का कलरव

गोपिकाओं का यमुना से जल भरकर लाना, पैंजनियों की रुनझुन

ग्वालवालों संग नित्य नयी खेल-लीलाएं

कदम्ब पर बैठकर बंशी बजाना, गोपियों का दौड़कर आना

यहाँ की सभी कुंज-निकॅज बहुत ही भाग्यशाली हैं क्योंकि कहीं प्यारे श्याम सुन्दर का किसी लता में पीताम्बर उलझा तो कहीं किसी निकॅज में श्यामाजू का आँचल उलझा। प्रभु श्री श्याम सुन्दर की सभी निकुँज लीलायें सभी भक्तों, रसिकजनों सन्तों को आनन्द प्रदान करती हैं।

ब्रज की महिमा

✨ ब्रज का हर वृक्ष देव हैं, हर लता देवांगना है

✨ यहाँ की बोली में माधुर्य है, बातों में लालित्य है

✨ यहाँ की गति ही नृत्य है, कण-कण में राधा-कृष्ण की छवि है

✨ दिशाओं में भगवद नाम की झलक, प्रतिपल कानों में राधे-राधे की झलक

✨ देवलोक-गोलोक भी इसके समक्ष नतमस्तक हैं

सम्पूर्ण ब्रज-मण्डल का प्रत्येक रज-कण, वृक्ष, पर्वत, पावन कुण्ड-सरोवर और श्री यमुनाजी श्रीप्रिया-प्रियतम की नित्य निकुंज लीलाओं के साक्षी हैं।

श्री कृष्ण जी ने अपने ब्रह्मत्व का त्याग कर सभी ग्वाल बालों और ब्रज गोपियों के साथ अनेक लीलाएँ की हैं। यहाँ उन्होने अपना बचपन बिताया। जिसमें उन्होने ग्वाल बालों के साथ क्रीड़ा, गौ चारण, माखन चोरी, कालिया दमन आदि अनेक लीलाएँ की हैं। भगवान कृष्ण की इन लीलाओं पर ही व्रज के नगर, गाँव, कुण्ड, घाट आदि स्थलों का नामकरण हुआ है।

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जय हो ब्रज रज की 🌸

श्री राधा

राधा श्री राधा रहूं, निति निसि आठों याम।
जा उर श्री राधा बसै, सोइ हमारो धाम

" जब-जब इस धराधाम पर प्रभु अवतरित हुए हैं उनके साथ साथ उनकी आहलादिनी शक्ति भी उनके साथ ही रही हैं। स्वयं श्री भगवान ने श्री राधा जी से कहा है 'हे राधे। जिस प्रकार तुम ब्रज में श्री राधिका रूप से रहती हो, उसी प्रकार क्षीरसागर में श्री महालक्ष्मी, ब्रह्मलोक में सरस्वती और कैलाश पर्वत पर श्री पार्वती के रूप में विराजमान हो।'

भगवान के दिव्य लीला विग्रहों का प्राकट्य ही वास्तव में अपनी आराध्या श्री राधा जू के निमित्त ही हुआ है। श्री राधा जू प्रेममयी हैं और भगवान श्री कृष्ण आनन्दमय हैं। जहाँ आनन्द है वहीं प्रेम है और जहाँ प्रेम है वहीं आनन्द है।

आनन्द-रस-सार का धनीभूत विग्रह स्वयं श्री कृष्ण हैं और प्रेम-रस-सार की धनीभूत श्री राधारानी हैं अतः श्री राधा रानी और श्री कृष्ण एक ही हैं। श्रीमद्भागवत् में श्री राधा का नाम प्रकट रूप में नहीं आया है, यह सत्य है। किन्तु वह उसमें उसी प्रकार विद्यमान है जैसे शरीर में आत्मा।

श्री राधा रानी महाभावरूपा हैं और वह नित्य निरंतर आनन्द-रस-सार, रस-राज, अनन्त सौन्दर्य, अनन्त ऐश्वर्य, माधुर्य, लावण्यनिधि, सच्चिदानन्द स्वरूप श्री कृष्ण को आनन्द प्रदान करती हैं। श्री कृष्ण कहते हैं "जो तुम हो वही मैं हूँ हम दोनों में किंचित भी भेद नहीं हैं।" जैसे दूध में श्वेतता, अग्नि में दाहशक्ति और पृथ्वी में गंध रहती हैं उसी प्रकार मैं सदा तुम्हारे स्वरूप में विराजमान रहता हूँ।

वृन्दावन लीला

वृन्दावन लीला लौकिक लीला नहीं है। लौकिक लीला की दृष्टि से तो ग्यारह वर्ष की अवस्था में श्री कृष्ण ब्रज का परित्याग करके मथुरा चले गये थे। परन्तु अलौकिक जगत में दोनों सर्वदा एक ही हैं। श्री कृष्ण ने श्री ब्रह्मा जी को श्री राधा जी के दिव्य चिन्मय प्रेम-रस-सार विग्रह का दर्शन कराने का वरदान दिया था, उसकी पूर्ति के लिये एकान्त अरण्य में ब्रह्मा जी को श्री राधा जी के दर्शन कराये और वहीं ब्रह्मा जी के द्वारा रस-राज-शेखर श्री कृष्ण और महाभाव स्वरूपा श्री राधा जी की विवाह लीला भी सम्पन्न हुई।

गोरे मुख पै तिल बन्यौ, ताहिं करूं प्रणाम।
मानों चन्द्र बिछाय के पौढे शालिग्राम ॥

रस राज श्री कृष्ण आनन्दरूपी चन्द्रमा हैं और श्री प्रिया जू उनका प्रकाश है। श्री कृष्ण जी लक्ष्मी को मोहित करते हैं परन्तु श्री राधा जू अपनी सौन्दर्य सुषमा से उन श्री कृष्ण को भी मोहित करती हैं।

श्री राधा नाम की महिमा

"जिस समय मैं किसी के मुख से 'रा' अक्षर सुन लेता हूँ, उसी समय उसे अपना उत्तम भक्ति-प्रेम प्रदान कर देता हूँ और 'धा' शब्द का उच्चारण करने पर तो मैं प्रियतमा श्री राधा का नाम सुनने के लोभ से उसके पीछे-पीछे चल देता हूँ"

आधौ नाम तारिहै राधा।
र के कहत रोग सब मिटिहैं, ध के कहत मिटै सब बाधा ॥
राधा राधा नाम की महिमा, गावत वेद पुराण अगाधा।
अलि किशोरी रटौ निरंतर, वेगहि लग जाय भाव समाधा ॥

ब्रज रज के प्राण श्री ब्रजराज कुमार की आत्मा श्री राधिका हैं। एक रूप में जहाँ श्री राधा श्री कृष्ण की आराधिका, उपासिका हैं वहीं दूसरे रूप में उनकी आराध्या एवं उपास्या भी हैं। "आराध्यते असौ इति राधा।" शक्ति और शक्तिमान में वस्तुतः कोई भेद न होने पर भी भगवान के विशेष रूपों में शक्ति की प्रधानता हैं।

ब्रज मण्डल के कण कण में है बसी तेरी ठक्राई।
कालिन्दी की लहर लहर ने तेरी महिमा गाई ॥
पुलकित होयें तेरो जस गावें श्री गोवर्धन गिरिराई।
लै लै नाम तेरौ मुरली पै नाचे कुँवर कन्हाई ॥

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श्री कृष्ण

पूर्ण ब्रह्म • अखिलरसामृतमूर्ति • सर्वातीत

भगवान श्री कृष्ण वास्तव में पूर्ण ब्रह्म ही हैं। उनमें सारे भूत, भविष्य, वर्तमान के अवतारों का समावेश है। भगवान श्री कृष्ण अनन्त ऐश्वर्य, अनन्त बल, अनन्त यश, अनन्त श्री, अनन्त ज्ञान और अनन्त वैराग्य की जीवन्त मूर्ति हैं। वे कभी विष्णु रूप से लीला करते हैं, कभी नर-नारायण रूप से तो कभी पूर्ण ब्रह्म सनातन रूप से। सारांश ये है कि वे सब कुछ हैं, उनसे अलग कुछ भी नहीं।

अपने भक्तों के दुखों का संहार करने के लिये वे समय-समय पर अवतार लेते हैं और अपनी लीलाओं से भक्तों के दुखों को हर लेते हैं। उनका मनोहारी रूप सभी की बाधाओं को दूर कर देता है।

श्री कृष्ण स्वयं भगवान हैं, अतएव उनके द्वारा सभी लीलाओं का सुसम्पन्न होना इष्ट है। वे ही सबके हृदयों में व्याप्त अन्तर्यामी हैं, वे ही सर्वातीत हैं और वे ही सर्वगुणमय, लीलामय, अखिलरसामृतमूर्ति श्री भगवान हैं।

उनके अवतार

पुरुषावतार गुणावतार लीलावतार अंशावतार कलावतार आवेशावतार प्रभवावतार वैभवावतार परावस्थावतार

सभी उन्हीं से होते हैं

श्रीकृष्ण प्राकट्य कथा

भगवान श्री कृष्ण के प्राकट्य का समय था भाद्रपद अष्टमी की अर्धरात्रि और स्थान था अत्याचारी कंस का कारागार। पर स्वयं भगवान के प्राकट्य से काल, देश आदि सभी परम धन्य हो गये।

उस मंगलमयी घटना को हुए पाँच हजार से अधिक वर्ष बीत चुके हैं परन्तु आज भी प्रति वर्ष श्री कृष्ण जी का प्राकट्योत्सव वही पवित्र भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की मंगल अष्टमी को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

मथुरा नगरी के महाराज उग्रसैन भगवान के भक्त थे। लेकिन उनका पुत्र कंस बहुत ही अत्याचारी था। उसने अपने पिता को ही बंदी बना लिया एवं स्वयं मथुरा नगरी का नरेश बन गया। कंस ने अपनी बहिन देवकी का विवाह वासुदेव जी के साथ कर दिया। तभी भविष्यवाणी हुई कि देवकी का आठवाँ पुत्र ही कंस का काल होगा। इससे भयभीत होकर उसने देवकी और वासुदेव जी को कारागार में डाल दिया। मृत्यु के भय से उसने देवकी के छः पुत्रों को जन्म लेते ही मार दिया। इसके पश्चात् भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की मंगल अष्टमी तिथि को श्री कृष्ण जी ने अवतार लिया। बड़े-बड़े देवता तथा मुनिगण आनन्द में भरकर पृथ्वी के सौभाग्य की सराहना करने लगे।

गोपियों के भाव

मोहन नैना आपके नौका के आकार।
जो जन इनमें वस गये हो गये भव से पार ||

आओ प्यारे मोहना पलक झाँप तोहि लेउ।
न में देखूं और को न तोहि देखन देउ।।

आ कर लकुटी मुरली गहें घूंघर वाले केस।
यह बानिक मो हिय बसौ, स्याम मनोहर वेस।।

जय कन्हैया लाल की 🌸
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ब्रज चौरासी कोस की परिकम्मा एक देत ।
लख चौरासी योनि के संकट हरिहर लेत ॥

ब्रज चौरासी कोस यात्रा

यात्रा की उत्पत्ति

एक बार नन्दबाबा और यशोदा मैया ने सभी तीर्थ स्थलों के दर्शन यात्रा पर जाने की इच्छा प्रकट की। तो श्री कृष्ण जी ने उनसे कहा, "मैया, मैं सारे तीर्थों को ब्रज में ही बुला लेता हूँ। तुम ब्रज में ही सभी तीर्थ स्थलों की दर्शन-यात्रा कर लेना।" अतः समस्त तीर्थ ठाकुर जी की आज्ञानुसार ब्रज में निवास करने लगे।

ऐसा माना गया है कि ब्रज-धाम की परिक्रमा यात्रा सर्वप्रथम चतुर्मुख ब्रह्मा जी ने की थी। वत्स हरण के पश्चात् उनके अपराध की शान्ति के लिये स्वयं श्रीकृष्ण ने उन्हें ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा करने का आदेश दिया था। तभी से ब्रज यात्रा का सूत्रपात हुआ।

श्री कृष्ण जी के प्रपौत्र श्री वज्रनाभजी द्वारा भी ब्रज यात्रा की गयी थी। कालांतर में परम रसिक संत शिरोमणि श्री स्वामी हरिदासजी, श्री हरिवंश जी, श्रीवल्लभाचार्य जी, श्री हरिराम व्यास जी, श्री चैतन्य महाप्रभु जी आदि अनेक वैष्णव एवं गौड़ीय सम्प्रदाय आचार्यों द्वारा ब्रज यात्रा का सुत्र पात हुआ जिसे आज भी लाखों भक्त प्रतिवर्ष करते हैं। ब्रज चौरासी कोस की यात्रा करने से मनुष्य को चौरासी लाख योनियों से छुटकारा मिल जाता है।

ब्रज शब्द का अर्थ एवं क्षेत्र

सत्य, रज, तम इन तीनों गुणों से अतीत जो पराब्रह्म है, वही व्यापक है। इसीलिए उसे ही ब्रज कहते हैं। यह सच्चिदानन्द स्वरूप परम ज्योतिर्मय और अविनाशी है। वेदों में भी ब्रज शब्द का प्रयोग हुआ है। "व्रजन्ति गावो यस्मिन्नति ब्रजः" अर्थात् गौचारण की स्थली ही ब्रज कहलाती है।

ब्रज क्षेत्र में आते हैं:

  • उत्तर प्रदेश का मथुरा जिला
  • राजस्थान के भरतपुर जिले की डीग और कामां तहसील
  • हरियाणा के फरीदाबाद जिले की होडल तहसील

ब्रज की महिमा

हमारे देश की पवित्र भूमि ब्रज का स्मरण करते ही हृदय प्रेम रस से सराबोर हो जाता है, एवं श्री कृष्ण के बाल रूप की छवि मन-मस्तिष्क पर अंकित होने लगती है। ये ब्रज की महिमा है की सभी तीर्थ स्थल भी व्रज में निवास करने को उत्सुक हुए थे।

1

भगवान श्री कृष्ण द्वारा वन गोचारण से व्रज रज का कण-कण कृष्णरूप हो गया है

2

विश्व के पालनकर्ता यहाँ माखनचोर बन गये, गोपियों से दधि का दान लिया

3

जहाँ देव, ऋषि, ब्रह्मा, शंकर स्तुति करते हैं, वहीं ब्रजगोपियों की गाली सुनकर कृष्ण कृपा बरसाते हैं

रसखान ने व्रज रज की महिमा बताते हुए कहा है "एक ब्रज रेणुका पै चिन्तामनि वार डारूँ"

देवों के वचन

श्री ब्रह्मा जी: "भगवान्! मुझे इस धरातल पर विशेषतः गोकुल में किसी साधारण जीव की योनि मिल जाय, जिससे मैं वहाँ की चरण-रज से अपने मस्तक को अभिषिक्त करने का सौभाग्य प्राप्त कर सकूँ।"

भगवान शंकर:
"नारायण ब्रजभूमि को, को न नवावै माथ, जहाँ आप गोपी भये श्री गोपेश्वर नाथ।"

सूरदास जी: "जो सुख ब्रज में एक घरी, सो सुख तीन लोक में नाहीं"

बृज की ऐसी विलक्षण महिमा है कि स्वयं मुक्ति भी इसकी आकांक्षा करती है -

मुक्ति कहै गोपाल सौ मेरि मुक्ति बताय।
ब्रज रज उडि मस्तक लगै मुक्ति मुक्त हो जाय ॥

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श्री कृष्ण जी उद्धव जी से कहते हैं

"'ऊधौ मोहि ब्रज विसरत नाहीं।
हंस-सुता की सुन्दर कगरी, अरु कुञ्जनि की छाँहीं।
ग्वाल-बाल मिलि करत कुलाहल, नाचत गहि गहि बाहीं ॥
यह मथुरा कञ्चन की नगरी, मनि- मुक्ताहल जाहीं।
जबहिं सुरति आवति वा सुख की. जिय उमगत तन नाहीं ॥
अनगन भाँति करी बहु लीला, जसुदा नन्द निबाहीं।
सूरदास प्रभु रहे मौन ह्वै. यह कहि - कहि पछिताहीं ॥"

जय जय ब्रज धाम की 🌸

वृन्दावन धाम

वृन्दावन धाम कौ वास भलाँ, जहाँ पास बहै यमुना पटरानी।
जो जन न्हाय के ध्यान करै, बैकुण्ठ मिले तिनको रजधानी ॥

ब्रज का हृदय श्रीवृन्दावन धाम श्री प्रिया-प्रियतम की नित्य नवरस केलि से आच्छादित है। यहाँ की पावन भूमि नित्य नव कॅज, पुष्प, लताओं से घिरी रहती है। यमुना जी के पावन किनारों पर कदम्ब, तमाल आदि के वृक्ष बल्लरियाँ श्री युगल सरकार की नित्य लीलाओं को प्रकट कराने के लिये आतुर रहते हैं और यही विचार करते रहते हैं कि कब प्यारे श्याम सुन्दर आयें और हमें भी अपनी लीलाओं का प्रतिभागी बनायें।

यहाँ के वन-उपवन, कॅज-निकॅज, कुण्ड-सरोवर, यमुना के पावन तट आदि श्याम सुन्दर की लीलाओं के प्रत्यक्ष साक्षी हैं। श्रीवृन्दावन प्रभु के गोलोक धाम का ही प्रतिबिम्ब है।

यह नित्य निरंतर शास्वत है। इस नित्य लीला धाम के प्रकट होने पर श्री प्रिया-प्रियतम आ विराजते हैं- अपने दिव्य रस से अभिसिंचित परिवेष में अपनी रासेश्वरी प्रियाज एवं प्रिय सखियों सहित अपनी विभिन्न लीलायें सम्पन्न करते हैं। इन लीलाओं का परिपूर्ण वर्णन शब्दों में व्यक्त करना बहुत कठिन हैं, क्योंकि इन्हें तो अपने मन को एकाग्र कर प्रभु की इन चिन्मय लीलाओं में खोकर इस रस को नेत्रों से पान किया जाता है और कानों से सुना जाता है।

गोकुल से वृन्दावन

सभी गोकुलवासी कंस के आतंक से भयभीत थे। तब गोप उपनन्द जी ने सुझाव दिया कि यमुना के पार एक सुन्दर वृन्दावन है जहाँ अनेक वृक्ष, वन, पावन यमुना, गोवर्धन पर्वत आदि हैं। यह स्थान हमारे लिये तो सुरक्षित है ही, हमारी गायों के लिये भी विचरण करने हेतु यहाँ अनेक वन हैं। सभी गोकुलवासी इस पर सहमत हो गये और उन्होंने वृन्दावन को अपना निवास स्थल बनाया। गोवर्धन, बरसाना, नन्दगाँव आदि भी वृन्दावन की परिसीमा में आते थे।

धन वृन्दावन धाम है, धन वृन्दावन नाम।
धन वृन्दावन रसिक जो सुमिरै स्यामा स्याम।

श्रीकृष्ण जी का वचन

श्रीकृष्ण जी ने कहा है- "वृन्दावन मेरा निज धाम है।" इस वृन्दावन में जो समस्त पशु, पक्षी, मृग, कीट, मानव एवं देवता गण वास करते हैं वे मेरे ही अधिष्ठान में वास करते हैं और देहावसान के बाद सब मेरे धाम को प्राप्त होते हैं। वृन्दावन के वृक्ष साक्षात कल्पतरु हैं, यहाँ की भूमि दर्पण के समान एवं मन्दिर, गौशाला स्थानों की भूमि तो चिन्तामणि स्वरूप, सर्व अभिलाषाओं की पूर्ति करने में समर्थ है।

वृन्दावन के वृक्ष को मरहम न जाने कोय,
यहाँ डाल डाल और पात पात श्री राधे राधे होय।

वृन्दावन का अनुभव

वृन्दावन की छवि प्रतिक्षण नवीन है। आज भी चारों ओर आराध्य की आराधना और इष्ट की उपासना के स्वर हर क्षण सुनाई देते हैं। कोई भी अनुभव कर सकता है कि वृन्दावन की सीमा में प्रवेश करते ही एक अदृश्य भाव, एक अदृश्य शक्ति हृदय स्थल के अन्दर प्रवेश करती है और वृन्दावन की परिधि छोड़ते ही यह दूर हो जाती है।

सूरदास जी का पद

अष्टछाप कवि सूरदास जी ने वृन्दावन रज की महिमा के वशीभूत होकर गाया है-

हम ना भई वृन्दावन रेणु,
तिन चरनन डोलत नंद नन्दन नित प्रति चरावत धेनु।
हम ते धन्य परम ये द्रुम वन बाल बच्छ अरु धेनु।
सूर सकल खेलत हँस बोलत संग मध्य पीवत धेनु ॥

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जय हो वृन्दावन बिहारी की 🌸

वृन्दावन धाम के दर्शनीय स्थल

जहाँ कण-कण में श्री राधा-कृष्ण की लीला बसी है

निधिवन

श्री राधारानी की अष्ट सखियों में प्रधान श्री ललिता सखी जी के अवतार रसिक संत संगीत शिरोमणि श्री स्वामी हरिदास जी महाराज की यह साधना स्थली है। श्री स्वामी हरिदास जी नित्य यमुना स्नान करके यहीं पर प्रिया-प्रियतम की साधना किया करते थे। यहीं पर उन्होंने श्री बाँके बिहारी जी महाराज को प्रकट किया।

यह स्थली आज भी वृन्दावन के प्राचीन रूप को संजोये है। यहाँ पर श्री प्रिया-प्रियतम आज भी रात्रि में रास रचाते हैं। यहाँ श्री स्वामी हरिदास जी की समाधि, रंग महल, बाँके बिहारी जी का प्राकट्य स्थल, राधा रानी बंशी चोर आदि दर्शनीय हैं। सम्राट अकबर ने तानसेन के साथ यहाँ स्वामी हरिदास जी महाराज के दर्शन किये थे, एवं स्वामी श्रीहरिदास जी ने अकबर के अहंकार को भंग किया था।

बाँके बिहारी मन्दिर

यह वृन्दावन का सबसे प्रमुख मन्दिर है। श्री बाँके बिहारी जी के दर्शन करे बिना तो वृन्दावन की यात्रा भी अधूरी रह जाती है। श्री बाँके बिहारी जी को स्वामी श्री हरिदास जी महाराज ने निधिवन में प्रकट किया था। वर्तमान मन्दिर का निर्माण सन् 1864 में सभी गोस्वामियों के सहयोग से कराया गया।

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राधा वल्लभ मन्दिर

यह वृन्दावन का प्राचीन एवं प्रसिद्ध मन्दिर है। इसमें श्री हित हरिवंश द्वारा सेवित श्री राधावल्लभ जी के दर्शन हैं। श्री हितहरिवंश ने विवाह के समय दहेज के रूप में श्री राधावल्लभ विग्रह को प्राप्त किया था। "राधावल्लभ दर्शन दुर्लभ" यह उक्ति ही पर्याप्त है।

यहाँ सात आरती एवं पाँच भोग वाली सेवा पद्धति का प्रचलन है। समाज गायन, व्याहुला उत्सव एवं खिचड़ी महोत्सव विशेष हैं।

श्रीनृसिंह मन्दिर

श्री राधावल्लभ घेरे के प्रवेश द्वार के पास ही प्राचीन श्री नृसिंह जी भगवान् का मन्दिर है। नृसिंह चतुर्दशी के दिन शाम को यहाँ हिरण्यकशिपु वध की लीला का आयोजन होता है।

सेवा कॅज

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा प्रकट किये गये लीला स्थलों में सेवा कुंज का विशेष स्थान है। यहाँ एक छोटे से मन्दिर में श्रीराधिका के चित्रपट की पूजा होती है, चित्र में श्री कृष्ण राधाजू के चरणों की सेवा कर रहे हैं।

आज भी श्री राधा-माधव यहाँ विहार करते हैं अतः रात्रि काल में कोई भी भक्त अन्दर प्रवेश नहीं करता। यहाँ लिता कुण्ड है जिसे रासलीला के समय ललिता जी को प्यास लगने पर श्रीकृष्ण जी ने अपनी मुरली से प्रकट किया।

राधा दामोदर मन्दिर

इस मन्दिर में श्री राधा दमोदर जी महाराज के दर्शन हैं। साथ में श्री वृन्दावन चन्द, श्री छैलचिकनिया, श्री राधाविनोद और श्री राधामाधव के विग्रह विराजमान हैं।

सनातन गोस्वामी जी की गोवर्धन शिला यहाँ प्रतिष्ठित है। इस मन्दिर की चार परिक्रमा देने पर गोवर्धन की परिक्रमा का फल मिलता है।

राधा रमण मन्दिर

श्री राधा रमण जी का मन्दिर श्री गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के सुप्रसिद्ध मन्दिरों में से एक है। श्री गोपाल भट्ट जी शालिग्राम शिला की पूजा करते थे। भक्त वत्सल श्री कृष्ण जी ने उनकी मनोकामना पूर्ण कर शालिग्राम से श्री राधारमण जी प्रकट हुए। श्री राधा रमण जी के वामांग में गोमती चक्र सेवित है।

श्रीराधा श्याम सुन्दर मन्दिर

सन् 1578 की बसंत पंचमी को श्रीराधा रानी जी ने अपने हृदय-कमल से श्री श्याम सुन्दर जी को प्रकट करके श्री श्यामा नन्द प्रभु को प्रदान किया था। सम्पूर्ण विश्व में श्री श्याम सुन्दर जी ही एक मात्र ऐसे श्री विग्रह हैं जो श्री राधा रानी जी के हृदय से प्रकट हुए हैं। कार्तिक मास में प्रतिदिन यहाँ भव्य झांकियों के दर्शन होते हैं।

श्री गोविन्द देव जी मन्दिर

यह वृन्दावन का ईट-पत्थरों का बना प्रथम मन्दिर है। श्री गोविन्द देव जी का विग्रह श्री रूप गोस्वामी जी को गोमा टीला से मिला था। निर्माण संवत 1647 में जयपुर नरेश श्री मानसिंह ने कराया। औरंगजेब के काल में ऊपरी मंजिलें तोड़ी गईं। सन् 1748 में प्रतिभू विग्रह की स्थापना हुई। यहाँ गोविन्द देव जी और उनके वाम भाग में श्री राधा जी विराजमान हैं।

श्री मदन मोहन जी

यह मन्दिर आदित्य टीला पर स्थित है। प्राचीन मन्दिर का निर्माण राम दास कपूर द्वारा श्री सनातन गोस्वामी जी की प्रेरणा से कराया गया। मुगल आक्रमण के कारण श्री मदन मोहन जी को करौली में विराजमान कर दिया गया। पुरी के राजा के पुत्र ने श्री राधा एवं श्री ललिता जी के विग्रह भेजे जो आज भी यहाँ सेवित हैं।

कृष्ण बलराम मन्दिर (इस्कॉन)

यह मन्दिर वृन्दावन-छटीकरा मार्ग पर स्थित है। निर्माण सन् 1975 में श्री ए०सी० भक्तिवेदान्त स्वामी द्वारा हुआ। गर्भ-मन्दिर में तीन कक्ष हैं - मध्य में श्री कृष्ण-बलराम, बायीं ओर श्रीनिताई-गौरांग, दायें में श्री राधा-श्यामसुन्दर ललिता-विशाखा सहित।

श्री रंगनाथ जी मन्दिर

श्री वृन्दावन का यह सबसे विशाल मन्दिर है। दक्षिण शैली का यह वैभवशाली मन्दिर सेठ राधाकृष्ण, लक्ष्मीचन्द्र, गोविन्द दास ने बनवाया। मूल मन्दिर में श्री रंगनाथ जी विराजमान हैं। सोने का 60 फुट ऊँचा खम्भा, सोने की मूर्तियाँ, विशाल रथ दर्शनीय हैं। चैत्र मास में भव्य मेला लगता है।

शाह जी का मन्दिर

"टेडे खम्भे वाले मन्दिर" के नाम से प्रसिद्ध। निर्माण लखनऊ के कुन्दनलाल शाह जी ने कराया। इसमें श्री राधा-रमण के विग्रह सेवित हैं। संगमर के टेड़े खम्भे आकर्षित करते हैं। बसंत पंचमी पर भव्य बसंती कमरा दर्शनीय है।

गोपेश्वर महादेव

जब श्री कृष्ण महारास कर रहे थे, तो महादेव जी को इस दिव्यलीला को देखने की इच्छा हुई। लेकिन महारास में पुरुष प्रवेश वर्जित था। अतः शंकर जी ने श्री ललिता सखी जी से गोपी बनने की दीक्षा ली। शंकर जी यहाँ गोपी रूप में विराजमान हैं। श्री गणेश जी, पार्वती जी, श्री नन्दीश्वर जी आदि साथ में हैं।

कालीदह

यमुना जी में कालियानाग का कुण्ड। श्री कृष्ण ने कदम्ब वृक्ष से छलांग लगाकर कालिया नाग का दमन किया। शरणागत कालिया पर कृपा कर श्री कृष्ण ने उसे समुद्र में जाने का आदेश दिया।

केशीघाट

श्री कृष्ण ने यहाँ केशीदैत्य का वध किया था। यहाँ पर यमुना जी का मन्दिर भी स्थित है। नित्य सायं यहाँ यमुना जी की आरती होती है।

अक्रूर घाट

अक्रूर जी कृष्ण और बलरामजी को मथुरा ले जा रहे थे। यमुना स्नान के समय अक्रूर जी को यमुना के अन्दर कृष्ण-बलराम जी और श्री कृष्ण के विराट रूप के दर्शन हुए।

जय जय वृन्दावन धाम की 🌸

धन-धन वृन्दावन रजधानी।
जहाँ विराजत मोहन राजा श्री राधा महारानी।
सदा सनातन एक रस जोरी महिमा निगम ना जानी।
श्री हरि प्रिया हितु निज दासी रहत सदा अगवानी ॥

वृन्दावन धाम की महिमा

वृन्दावन ब्रज का हृदय है जहाँ प्रिया-प्रियतम ने अपनी दिव्य लीलायें की हैं। इस दिव्य भूमि की महिमा बड़े-बड़े तपस्वी भी नहीं समझ पाते। ब्रह्मा जी का ज्ञान भी यहाँ के प्रेम के आगे फीका पड़ जाता है।

वृन्दावन रसिकों की राजधानी है यहाँ के राजा श्यामसुन्दर और महारानी श्री राधिका जी हैं। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि वृन्दावन का कण-कण रसमय है। वृन्दावन श्यामसुन्दर की प्रियतमा श्री राधिका जी का निज धाम है। सभी धामों से ऊपर है ब्रज धाम और सभी तीर्थो से श्रेष्ठ है श्री वृन्दावन।

तीर्थराज और वृन्दावन का प्रसंग

भगवान नारायण ने प्रयाग को तीर्थों का राजा बना दिया। अतः सभी तीर्थ प्रयागराज को कर देने आते थे। एक बार नारद जी ने प्रयागराज से पूछा- "क्या वृन्दावन भी आपको कर देने आता है?" तीर्थराज ने नकारात्मक उत्तर दिया। तो नारद जी बोले- "फिर आप तीर्थराज कैसे हुए।"

इस बात से दुखी होकर तीर्थराज भगवान के पास पहुँचे। भगवान ने प्रयागराज के आने का कारण पूछा। तीर्थराज बोले- "प्रभु! आपने मुझे सभी तीर्थों का राजा बनाया है। सभी तीर्थ मुझे कर देने आते हैं, लेकिन श्री वृन्दावन कभी कर देने नहीं आये। अतः मेरा तीर्थराज होना अनुचित है।"

भगवान ने प्रयागराज से कहा- "तीर्थराज ! मैंने तुम्हें सभी तीर्थों का राजा बनाया है। अपने निज गृह का नहीं। वृन्दावन मेरा घर है। यह मेरी प्रिया श्री किशोरी जी की विहार स्थली है। वहाँ की अधिपति तो वे ही हैं। मैं भी सदा वहीं निवास करता हूँ। वह तो आप से भी ऊपर है।"

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वृन्दावन की तुलना

एक बार अयोध्या जाओ, दो बार द्वारिका, तीन बार जाके त्रिवेणी में नहाओगे।
चार बार चित्रकूट, नौ बार नासिक, बार-बार जाके बद्रिनाथ घुम आओगे ॥
कोटि बार काशी, केदारनाथ रामेश्वर, गया-जगन्नाथ, चाहे जहाँ जाओगे।
होंगे प्रत्यक्ष जहाँ दर्शन श्याम श्यामा के, वृन्दावन सा कहीं आनन्द नहीं पाओगे ॥

जय हो रसिक राजधानी वृन्दावन की 🌸

मथुरा

सप्त मोक्षदायिनी पुरियों में श्रेष्ठ

सप्त मोक्षदायिनी पुरियाँ

अयोध्या मथुरा काशी काञ्ची माया अवन्ती द्वारावती

इन सभी पुरियों में मथुरा पुरी का विशेष महत्व है। क्यों न हो यहाँ पर स्वयं सच्चिदानन्द प्रभु श्री कृष्ण जी ने अवतार लिया है।

प्रभु श्री कृष्ण के सुदर्शन चक्र से रक्षित इस मथुरा पुरी का महत्व बैकुण्ठ से भी अधिक माना गया है, क्योंकि इस भूमि पर किसी भी प्रकार के प्रलय आदि विकारों का प्रभाव नहीं होता।

त्रेता युग का गौरव

मथुरा पुरी अति प्राचीन है। त्रेता युग में भगवान श्री राम के अनुज शत्रुघ्न जी द्वारा दैत्यराज मधु के पुत्र लवणासुर का संहार करके सभी मथुरावासियों को भयमुक्त किया।

द्वापर युग का अवतार

वहीं द्वापर युग में कंस के कारागार में श्री कृष्ण ने देवकी के गर्भ से प्रकट होकर इस नगर की महिमा को सम्पूर्ण विश्व में प्रकाशित किया।

श्री म‌द्भागवत के रचियता श्री व्यास जी का ब्रज से सम्बंध सर्वविदित है। श्री कृष्ण गंगा तीर्थ जो आज भी मथुरा में स्थित है, व्यास जी की तप स्थली रहा है।

द्वापर में श्री कृष्ण की जन्मादि विविध लीलाओं की स्थली होने का गौरव भी इसे प्राप्त है।

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आज की मथुरा

मथुरा नगरी में अनेक उतार-चढ़ाव आये परन्तु आज भी यमुना किनारे स्थित इस नगरी का सौन्दर्य, रमणीय वन, पतित पावनी यमुना जी के घाट एवं विभिन्न राजा और धनियों के महल और मन्दिर इस नगरी की शोभा बढ़ा रहे हैं।

इस भूमि का श्री कृष्ण जी के साथ शाश्वत सम्बंध इसीलिये भी अधिक है कि उनकी पटरानी श्री यमुना जी साक्षात कल-कल करती अपने दिव्य घाटों पर आज भी बह रही हैं।

जय कन्हैया लाल की - जय मथुरा नगरी 🌸

कछु माखन कौ बल बढौ, कछु गोपन करी सहाय।
श्री राधे जू की कृपा से गिरिवर लियाँ उठाया ॥

श्री गिरिराज जी

श्री गोवर्धन मथुरा से 22 किमी की दूरी पर स्थित है। पुराणों के अनुसार श्री गिरिराज जी को पुलस्त्य ऋषि द्रौणाचल पर्वत से ब्रज में लाये थे।

दूसरी मान्यता

त्रेता युग में दक्षिण में जब राम सेतुबंध का कार्य चल रहा था तो हनुमान जी इस पर्वत को उत्तराखंड से ला रहे थे। लेकिन सेतु बन्ध का कार्य पूर्ण होने की देव वाणी को सुनकर हनुमान जी ने इस पर्वत को ब्रज में स्थापित कर दिया।

इससे गोवर्धन पर्वत बहुत द्रवित हुए और उन्होंने हनुमान जी से कहा कि मैं श्री राम जी की सेवा और उनके चरण स्पर्श से वंचित रह गया। यह वृतांत हनुमानजी ने श्री राम जी को सुनाया तो राम जी बोले "द्वापर युग में मैं इस पर्वत को धारण करूंगा एवं इसे अपना स्वरूप प्रदान करूंगा।"

गोवर्धन पूजा की लीला

भगवान श्री कृष्ण बलराम जी के साथ वृन्दावन में रहकर अनेकों प्रकार की लीलाएँ कर रहे थे। उन्होंने एक दिन देखा कि वहाँ के सब गोप इन्द्र-यज्ञ करने की तैयारी कर रहे हैं।

भगवान श्री कृष्ण ने नन्दबाबा से पूछा- "बाबा आप सब जे का कर रहे हो?"
नन्दबाबा बोले "लाला, हम इन्द्र की पूजा करवे की तैयारी कर रहे हैं। वो ही हमें अन्न, फल आदि देवै।"
इस पर कन्हैया ने कहा - "अन्न, फल और हमारी गायों को भोजन तो हमें जे गोवर्धन पर्वत देवै। तुम सब ऐसे इन्द्र की पूजा काहे के करौं। मैं तुम सबन ते गोवर्धन महाराज की पूजा कराउंगो।"

सभी ब्रजवासी बोले "लाला! हम तो पुराने समय ते ही इन्द्र कू पूजते आ रहे हैं और सभी सुखी हैं, तू काहे कू ऐसे देवता की पूजा करावै जो इन्द्र हम ते रूठ जाय।" तो लाला ने कहा- "आप सब व्यर्थ की चिन्ता कू छोड़ कै मेरे गोवर्धन की पूजा करौ।"

तो सभी ने गोवर्धन महाराज की पूजा की और छप्पन भोग, छत्तीस व्यंजन आदि सामग्री का भोग लगाया। भगवान श्री कृष्ण जी गोपों को विश्वास दिलाने के लिये गिरिराज पर्वत के ऊपर दूसरे विशाल रूप में प्रकट हो गये और उनकी सभी सामग्री खाने लगे। यह देख सभी ब्रजवासी बहुत प्रसन्न हो गये।

इन्द्र का क्रोध और गिरिराज धारण

जब अभिमानी इन्द्र को पता लगा कि समस्त ब्रजवासी मेरी पूजा को बंद करके किसी और की पूजा कर रहे हैं, तो वह सभी पर बहुत ही क्रोधित हुए। इन्द्र ने तिलमिला कर प्रलय करने वाले मेघों को ब्रज पर मूसलाधार पानी बरसाने की आज्ञा दी।

मेघों ने प्रचण्ड गडगडाहट, मूसलाधार बारिश, एवं भयंकर आँधी-तूफान से सारे ब्रज का विनाश करना शुरू कर दिया। यह देख सभी ब्रजवासी दुखी होकर श्री कृष्ण जी से बोले "लाला तेरे कहवे पै हमने इन्द्र की पूजा नाय की जाते वो नाराज है गयौ है और हमें भारी कष्ट पहुँचा रहा है अब तू ही कछु उपाय कर।"

श्री कृष्ण जी ने सम्पूर्ण ब्रज मण्डल की रक्षा हेतु गोवर्धन पर्वत को खेल में उठा लिया एवं अपनी बायें हाथ की कनिका उंगली पर धारण कर लिया और समस्त ब्रजवासियों, गौओं को उसके नीचे एकत्रित कर लिया। श्री कृष्ण जी ने तुरन्त ही अपने सुदर्शन चक्र को सम्पूर्ण जल को सोखने के लिये आदेशित किया। श्री कृष्ण जी ने सात दिन तक गिरिराज पर्वत को उठाये रखा और सभी ब्रजवासी आनन्दपूर्वक उसकी छत्रछाया में सुरक्षित रहे।

इससे आश्चार्यचकित इन्द्र को भगवान की ऐश्वर्यता का ज्ञान हुआ एवं वो समझ गये कि यह तो साक्षात परम परमेश्वर श्री कृष्ण जी हैं। इन्द्र ने भगवान से क्षमा-याचना की एवं सभी देवताओं के साथ स्तुति की।

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श्री गिरिराज जी की महिमा

श्रीवृन्दावन के मुकुट स्वरूप श्री गोवर्धन पर्वत श्री कृष्ण के ही स्वरूप हैं। श्री कृष्ण सखाओं सहित गोचारण हेतु नित्य यहाँ आते हैं तथा विभिन्न प्रकार की लीलायें करते हैं।

परिक्रमा का महत्व

प्राचीन समय से ही श्री गोवर्धन की परिक्रमा का पौराणिक महत्व है। प्रत्येक माह के शुक्लपक्ष की एकादशी से पूर्णिमा तक लाखों भक्त यहाँ की सप्तकोसी परिक्रमा पैदल एवं कुछ भक्त दंडौती लगाते हैं।

प्रति वर्ष गुरु पूर्णिमा (मुड़िया पूनौ) पर यहाँ की परिक्रमा लगाने का विशेष महत्व है, इस अवसर पर लाखों भक्त परिक्रमा लगाते हैं। श्री गिरिराज तलहटी समस्त गौड़ीय सम्प्रदाय अष्टछाप कवि एवं अनेक वैष्णव रसिक संतों की साधाना स्थली रही है।

जय गिरिराज धरण की 🌸

गोवर्धन सप्तकोसी परिक्रमा

21 किमी • 21 प्रमुख स्थल • 7 दिन तक कृष्ण ने धारण किया

🗺️

गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा मार्ग
राधा कुण्ड से प्रारम्भ होकर राधा कुण्ड पर ही समाप्त

1

राधा कुण्ड

परिक्रमा का प्रारम्भ यहीं से होता है। श्री राधा जी ने अपने हाथों से खोदा था। स्नान से मनोकामना पूर्ण।

2

श्याम कुण्ड

श्री कृष्ण जी ने अपने पैर से खोदा। राधा कुण्ड के बगल में। युगल स्नान का महत्व।

3

कुसुम सरोवर

श्री राधा-कृष्ण की विहार स्थली। लाल पत्थर का बना सुन्दर घाट। सूर्यास्त का दृश्य मनोहारी।

4

मानसी गंगा

श्री कृष्ण जी ने मानसिक रूप से गंगा को बुलाया था। परिक्रमा वासी यहाँ स्नान अवश्य करते हैं।

5

गोविन्द कुण्ड

श्री गोविन्द जी का प्राचीन मन्दिर। यहाँ गोवर्धन महाराज को सबसे पहले भोग लगाया जाता है।

6

पूंछरी का लौठा

गोवर्धन पर्वत की पूंछ। यहाँ श्री कृष्ण ने इन्द्र से युद्ध किया था। विशाल शिला।

7

दानघाटी

श्री कृष्ण गोपियों से दूध-दही का दान मांगते थे। यहाँ मन्दिर में दानलीला के दर्शन।

8

जतीपुरा

गोवर्धन महाराज का मुख्य मन्दिर। यहाँ अन्नकूट महोत्सव होता है। 56 भोग का दर्शन।

9

मुखारविन्द

गोवर्धन पर्वत का मुख। यहाँ पर्वत से चरण चिन्ह प्रकट होते हैं। दुग्धाभिषेक होता है।

10

आन्यौर

श्री कृष्ण ने यहाँ गोपियों को दर्शन दिया था। प्राचीन बावड़ी और मन्दिर।

11

गोवर्धन नाथ मन्दिर

वल्लभ सम्प्रदाय का मुख्य मन्दिर। श्रीनाथ जी का स्वरूप। यहाँ परिक्रमा पूर्ण होती है।

12

चिकसौली

श्री कृष्ण ने यहाँ ग्वाल बालों के साथ भोजन किया था। शीतला माता का मन्दिर।

13

गहवर वन

घना जंगल। श्री राधा-कृष्ण की निकुंज लीला स्थली। रसिक संतों की साधना भूमि।

14

चारण पहाड़ी

श्री कृष्ण यहाँ गाय चराते थे। पहाड़ी पर हनुमान जी का मन्दिर।

15

द्रोण पर्वत

पुलस्त्य ऋषि जहाँ से गिरिराज को लाए थे। मान्यता है यही द्रोणाचल का भाग है।

16

सूरज कुण्ड

सूर्य देव की तपस्या स्थली। कुष्ठ रोग निवारण के लिए प्रसिद्ध।

17

चन्द्र सरोवर

चन्द्र देव ने यहाँ तपस्या की। रात्रि में चाँदनी का प्रतिबिम्ब सुन्दर लगता है।

18

लिता कुण्ड

श्री ललिता सखी का कुण्ड। रासलीला में प्यास लगने पर कृष्ण ने मुरली से प्रकट किया।

19

विशाखा कुण्ड

श्री विशाखा सखी का कुण्ड। सखियों की लीलाओं का साक्षी।

20

अप्सरा कुण्ड

देवताओं की अप्सराएं यहाँ स्नान करती थीं। बहुत पवित्र जल।

21

राधा कुण्ड - समापन

परिक्रमा यहीं समाप्त होती है। दण्डवत परिक्रमा करने वाले भक्त यहीं प्रणाम करते हैं।

📝 परिक्रमा के नियम

  • दूरी: लगभग 21 किमी - 7 से 8 घंटे लगते हैं
  • समय: सुबह 4 बजे से शाम 6 बजे तक
  • विशेष दिन: गुरु पूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिमा पर लाखों भक्त
  • प्रकार: पैदल, दण्डवत, साइकिल परिक्रमा
जय श्री गिरिराज धरण की जय 🌸

कछु माखन कौ बल बढौ, कछु गोपन करी सहाय।
श्री राधे जू की कृपा से गिरिवर लियाँ उठाया ॥

गोवर्धन में दर्शनीय स्थल

जहाँ हर पत्थर, हर कुण्ड में श्री कृष्ण की लीला बसी है

01

श्याम ढाक

ब्रज गोपिकाऐं दही-छाछ की मटकियाँ लेकर जा रहीं थीं। श्री कृष्ण और अन्य सखाओं ने उनसे दान मांगा। किसी के पास पात्र नहीं था। श्री कृष्ण जी ने कदम्ब वृक्षों से प्रार्थना की - "आप हमको दौना दे दो।"

तब कदम्ब वृक्षों ने अपने पत्तों को दौने का आकार प्रदान किया। आज भी यहाँ स्थित कदम्ब वृक्षों पर दौने के आकार के पत्ते आते हैं।
"श्याम ढाक के दौना, जा में खावै श्याम सलोना"

02

कुसुम सरोवर

यहाँ विशाल पुष्प वन था। किशोरी जी सखियों के साथ पुष्प चुनने आती थीं। एक दिन श्याम सुन्दर माली के रूप में आए और बोले - "कौन तुम फुलवा बीनन हारी"। किशोरी जी का नीलाम्बर झाड़ी में उलझ गया।

प्यारे श्यामसुन्दर ने नीलाम्बर छुड़ाया और गिरे हुए पुष्प बीनकर कुसुम सरोवर में धोकर श्री राधा जी की चोटी में गूँथ दिये।

03

नारद कुण्ड

कुसुम सरोवर के सामने ही यहाँ नारद कुण्ड है। यहाँ नारद जी का मन्दिर है। नारद जी ने यहाँ तपस्या की थी।

04

श्रीकृष्णकुण्ड

श्री कृष्ण ने अरिष्टासुर का वध किया। सखियों ने कहा "गौ-घाती" का दोष लगेगा। तो कृष्ण ने कहा - "मैं यहीं समस्त तीर्थों को प्रकट करता हूँ।"

चरण से पृथ्वी पर प्रहार किया तो पाताल से भोगवती का जल निकला। सभी तीर्थों को बुलाकर कहा - "इस जल में समाविष्ट हो जाओ"। श्री कृष्ण ने स्नान कर गोपियों को भी पापमुक्त किया।

05

उद्धव कुण्ड

यह कुसुम सरोवर के पास परिक्रमा मार्ग पर स्थित है। उद्धव जी ने ब्रजवास की कामना हेतु यहाँ लता-पता बनने की इच्छा प्रकट की, ताकि वह ब्रज में सदा निवास करें।

06

पूँछरी का लौठा

यह गोवर्धन पर्वत की पूँछ है। यहाँ लौठा पहलवान का मन्दिर है जिसे श्री नाथ जी का सखा कहते हैं। जब श्री नाथ जी राजस्थान जाने लगे तो लौठा जी ने कहा "मैं ब्रज छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा"।

श्री नाथ जी ने वरदान दिया - "बिना अन्न-जल के ही तुम स्वस्थ रहोगे।"
"धनि धनि पूँछरी के लौठा, अन्न खाये न पानी पीवै ऐसे ही पड़ौ सिलौठा"

07

गोविन्द कुण्ड

देवराज इन्द्र ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए यहीं पर श्री कृष्ण जी की पूजा-अर्चना की थी एवं कामधेनु के दूध से श्यामसुन्दर का अभिषेक किया था।

08

राधाकुण्ड

राधा जी ने कहा - "हम आपके गौहत्या पापलिप्त कुण्ड में क्यों स्नान करें"। सभी सखियों के साथ कंगनों से खोदकर सुन्दर कुण्ड बनाया और मानसी गंगा से जल भरा।

श्री कृष्ण ने सभी तीर्थों को आदेश दिया कि राधा कुण्ड में प्रविष्ट हो जाओ। श्री राधा जी ने वचन दिया - "इस कुण्ड में स्नान करने वालों को समस्त पापों से मुक्त कर दूंगी।"

प्रादुर्भाव: कार्तिक कृष्ण अष्टमी अर्धरात्रि। आज भी हजारों लोग यहाँ स्नान करते हैं।

09

माल्यहारी कुण्ड

दीपावली के उत्सव पर श्री राधिका जी ने जब श्री कृष्ण को श्रंगार के मोती नहीं दिये, तो भगवान श्री कृष्ण ने यहाँ मोतियों की खेती की थी।

10

जतीपुरा

इस स्थान पर गिरिराज शिला के नीचे श्री नाथ जी प्रकट हुए थे। यह स्थल श्री नाथ जी की विभिन्न लीलाओं को संजोये हुए है। औरंगजेब के आक्रमण के कारण बाद में श्री नाथ जी को नाथद्वारा ले जाया गया।

11

दानघाटी

गोवर्धन की चार घाटियों में सबसे प्रसिद्ध। यहाँ श्री गिरिराज मुखारबिन्द के सुन्दर दर्शन होते हैं। श्री कृष्ण अपने सखाओं के साथ ब्रजगोपियों को रोक कर दूध-दधि का दान लिया करते थे।

प्रायः यात्री दानघाटी से ही गोवर्धन परिक्रमा आरंभ करते हैं।

12

लक्ष्मी नारायण मन्दिर

दान घाटी के सामने विशाल मन्दिर। इसमें व्रज के प्रसिद्ध संत श्री गया प्रसाद जी को गिरिराज जी का साक्षात्कार यहीं पर हुआ था। उनके दर्शन से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।

13

आन्यौर

यही वह स्थान है जहाँ नन्दराय और यशोदा जी ने सभी ब्रजवासियों के साथ श्री गिरिराज जी को अनेक प्रकार के पकवान निवेदित किये थे। श्री कृष्ण गिरिराज स्वरूप में प्रकट होकर कह रहे थे "आन और आन और लाओ"। अतः नाम पड़ा - आन्यौर

14

चन्द्र सरोवर (पारसौली)

यहाँ भगवान श्री कृष्ण ने सर्वप्रथम 6 मास रात्रि की रास लीला की थी। गोवर्धन क्षेत्र में केवल इसी स्थान पर रासलीला का वर्णन मिलता है। यहाँ सूरदास जी की जन्मस्थली है।

जय जय श्री गिरिराज महाराज 🌸

मानसी गंगा

श्री कृष्ण के मन से प्रकट हुई पावन गंगा

मानसी गंगा के सभी घाटों का निर्माण जयपुर नरेश मान सिंह के पिता राजा भगवान दास ने कराया था।
मानसी गंगा का बहुत महत्व है।

मानसी गंगा के प्राकट्य की 3 कथायें

1

गौ हत्या पाप मुक्ति

श्री कृष्ण ने गोपियों के कहने पर वृष हत्या के पाप से मुक्त होने के लिये अपने मन से इसे प्रकट किया तथा इसमें स्नान कर पाप मुक्त हुए।

2

भागीरथी का आह्वान

नन्दबाबा, यशोदा मैया सभी ब्रजवासी गंगा स्नान को जा रहे थे। कृष्ण ने सोचा "सारे तीर्थ ब्रज में विद्यमान हैं"। मन में भागीरथी गंगा का स्मरण किया और दीपावली के दिन गंगा जी प्रकट हो गईं। तब से प्रतिवर्ष लाखों तीर्थ यात्री यहाँ दीपदान करते हैं।

3

यमुना की प्रार्थना

श्रीकृष्ण जी की पटरानी यमुना जी ने अपनी बड़ी बहिन गंगा देवी के ऊपर कृपा करने के लिये श्री कृष्ण जी से प्रार्थना की। श्री कृष्ण जी ने यमुना जी की प्रार्थना सुनकर गंगा जी का आह्वान किया और गोपियों के साथ जल विहार कर उन्हें कृतार्थ कर दिया।

मानसी गंगा पर दर्शनीय स्थल

01

श्री हरि देव मंदिर

यह मानसी गंगा के दक्षिण किनारे पर स्थित है। ये गिरिराज गोवर्धन के पूजनीय देव हैं। श्री कृष्ण ने एक स्वरूप से गिरिधारी बनकर अपनी हथेली पर अपने दूसरे स्वरूप गिरिराज जी को धारण किया था और अपने एक स्वरूप से इनकी पूजा की थी।

02

ब्रह्म कुण्ड

गौवत्स एवं ग्वालवालों के अपहरण के अपराध से मुक्ति पाने के लिये ब्रह्मा जी यहाँ श्री कृष्ण जी के सम्मुख आये। यहाँ उन्होंने श्री कृष्ण जी का पवित्र मंत्रों के साथ अभिषेक किया एवं उनकी स्तुति की। श्री कृष्ण जी के अभिषेक का पवित्र जल ही ब्रह्म कुण्ड है।

03

मनसा देवी

ब्रहम कुण्ड के ऊपर ही मानसी गंगा के किनारे मनसा देवी का मंदिर है। ये मनसा देवी और कोई नहीं स्वयं श्री कृष्ण जी की योगमाया देवी हैं।

04

गौ घाट

श्री कृष्ण इस घाट पर गौओं एवं बछड़ों को जल पिलाया करते थे। आज भी यहाँ गौ सेवा का विशेष महत्व है।

05

चकलेश्वर महादेव

मानसी गंगा के उत्तर में चकलेश्वर महादेव जी विराजमान हैं। इन्द्र के द्वारा घोर बारिश के समय इन महादेव ने अपने त्रिशूल को चक्र के समान धारण कर गिरिराज जी एवं समस्त ब्रजवासियों की रक्षा की थी। कुछ भक्तों का कहना है कि इनकी प्रार्थना से सुदर्शन चक्र ने रक्षा की थी। अतः नाम पड़ा चकलेश्वर महादेव

06

मुखार बिंद

मानसी गंगा के उत्तरी तट पर गोवर्धन जी का मुखारबिंद है। यहाँ गोवर्धन जी का दर्शन बैठी हुई गाय के समान है। जिसका पिछला भाग पूँछरी है।

उन्होंने अपनी गर्दन को घुमा कर मुख मंडल को अपने पेट के निकट रखा है। उनके दोनों नेत्र राधा कुण्ड और श्याम कुण्ड हैं। यहाँ प्रतिदिन अभिषेक, पूजन और अन्नकूट का आयोजन होता है।

🪔 दीपदान महोत्सव

प्रतिवर्ष दीपावली पर लाखों तीर्थ यात्री यहाँ दीपदान करते हैं एवं स्नान करते हैं। पूरे मानसी गंगा के घाट दीयों से जगमगा उठते हैं।

जय मानसी गंगा मैया की 🌸

बरसाना धाम

श्री राधा रानी की पावन नगरी - वृषभानुपुर

किशोरी श्री राधा जू की कृपा कटाक्ष के बिना मधुर रस का आस्वादन नहीं हो सकता। श्री कृष्ण भी इनके प्रेम में मतवाले तथा इनकी चरण रज के लिये लालायित रहते हैं। वैसे तो श्री राधा तथा श्री कृष्ण एक ही रस समुद्र के दो महान रत्न हैं, आनन्द आस्वादन हेतु ये दो देह धारण कर लीलायें कर रहे हैं।

जिस प्रकार श्री राधा जी के बिना कृष्ण जी की बाल लीलाओं का वर्णन अधूरा है उसी प्रकार बरसाना के बिना ब्रज का वर्णन नहीं किया जा सकता। बरसाना का प्राचीन नाम वृषभानुपुर है।

ब्रह्मा जी और बरसाना की उत्पत्ति

ब्रज में निवास करने के लिये स्वयं ब्रह्मा जी भी आतुर रहते थे एवं श्री कृष्ण लीलाओं का आनन्द लेना चाहते थे। अतः उन्होंने सतयुग के अंत में विष्णु जी से प्रार्थना की कि "आप जब ब्रज मण्डल में अपनी स्वरूपा श्री राधा जी एवं अन्य गोपियों के साथ दिव्य रास-लीलायें करें तो मुझे भी उन लीलाओं का साक्षी बनायें एवं अपनी वर्षा ऋतु की लीलाओं को मेरे शरीर पर संपन्न कर मुझे कृतार्थ करें।"

श्री ब्रह्मा जी की इस प्रार्थना को सुनकर भगवान विष्णु जी ने कहा- "हे ब्रह्मा! आप ब्रज में जाकर वृषभानुपुर में पर्वत रूप धारण कीजिये। पर्वत होने से वह स्थान वर्षा ऋतु में जलादि से सुरक्षित रहेगा, उस पर्वतरूप तुम्हारे शरीर पर मैं ब्रज गोपिकाओं के साथ अनेक लीलायें करूंगा और तुम उन्हें प्रत्यक्ष देख सकोगे।"

अतएव बरसाना में ब्रह्मा जी पर्वत रूप में विराजमान हैं। पद्मपुराण के अनुसार यहाँ विष्णु और ब्रह्मा नाम के दो पर्वत आमने सामने विद्यमान हैं। दाहिनी ओर ब्रह्म पर्वत और बायीं विष्णु पर्वत विद्यमान है।

नन्दबाबा और वृषभानु जी का सम्बंध

श्री नन्दबाबा एवं श्री वृषभानु जी का आपस में घनिष्ट प्रेम था। कंस के द्वारा भेजे गये असुरों के उपद्रवों के कारण जब श्री नन्दराय जी अपने परिवार, समस्त गोपों एवं गौधन के साथ गोकुल महावन छोड़कर नन्दगाँव में निवास करने लगे, तो श्री वृषभानु जी भी अपने परिवार सहित उनके पीछे-पीछे रावल को त्याग कर चले आये और नन्दगाँव के पास बरसाना में आकर निवास करने लगे।

यहाँ के पर्वतों पर श्री राधा-कृष्ण जी ने अनेक लीलाएँ की हैं। अपनी मधुर तोतली बोली से श्रीवृषभानु जी एवं कीरति जी को सुख प्रदान करती हुई श्री राधा जी बरसाने की प्रत्येक स्थली को अपने चरण स्पर्श से धन्य करती हैं।

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🌸 लठमार होली - बरसाना की पहचान

बरसाना गाँव लठमार होली के लिये प्रसिद्ध है जिसे देखने के लिये हजारों भक्त एकत्र होते हैं। यहाँ होली के दिन राधा रानी की सखियाँ नन्दगाँव से आए कृष्ण और ग्वालों पर लाठियों से होली खेलती हैं।

जय श्री राधे रानी की 🌸

बरसाना में दर्शनीय स्थल

जहाँ हर गली, हर शिला में राधा-कृष्ण की लीला बसी है

01

सांकरी खोर

ब्रह्म पर्वत और विष्णु पर्वत के मध्य संकरी गली को ही सांकरी खोर कहते हैं। इस मार्ग से गोपियाँ दूध-दही बेचने जाया करती थीं। एक बार श्री कृष्ण जी ने गोपियों को यहाँ रोक लिया और कर के रूप में दही-माखन मांगने लगे। सखियों के आनाकानी करने पर श्रीकृष्ण ने उनकी मटकी फोड़कर सारा दूध-दही लूट लिया।

भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी को यहाँ बूढ़ीलीला - मटकीफोड़ लीला होती है।

02

दानगढ़

यह ब्रह्म पर्वत के उत्तरी भाग में है। यहाँ श्री कृष्ण सखाओं के साथ श्री राधा एवं सखियों की प्रतीक्षा कर रहे थे। श्री राधा जी सूर्य पूजा के बहाने जा रहीं थीं तो कृष्ण बोले "आपको कर देना होगा।"

विशाखा सखी बोलीं "तुम कौन होते हो कर लेने वाले?" कृष्ण जी बोले "मैं कन्दर्पदेव का नियुक्त कर लेने वाला हूँ।" सखियाँ बोलीं "यहाँ की राजेश्वरी तो श्री राधा रानी हैं।" यहाँ दान बिहारी जी का मन्दिर है।

03

मानगढ़

एक बार श्याम सुन्दर राधा जी से मिलने जा रहे थे, मार्ग में पद्मा ने चन्द्रावली के विरह के बारे में बताया। श्री श्याम सुन्दर चन्द्रावली को सांत्वना देने चले गये। यह सुनकर श्रीराधाजी श्रीश्याम सुन्दर से मान कर बैठीं।

रसिक श्री कृष्ण ने बड़े कौशल से श्रीराधा जी का मान भंग किया।

04

रत्न कुण्ड

कृष्णजी ने मुक्ता कुण्ड में मोती उगाये, जिन्हें नन्दराय जी ने वृषभान जी के यहाँ भेजा। वृषभानु चिन्तित हो गये। राधा जी ने अपनी माँ से मोती का हार लिया और इस कुण्ड पर मोती की खेती कर दी। जिससे यहाँ विभिन्न प्रकार के मोती उग आये।

05

विलासगढ़

विष्णु पर्वत पर स्थित। यहाँ श्री राधा जी अपनी सखियों के साथ धूला खेलतीं थीं। यहाँ विलास मन्दिर है। यहाँ श्री राधा-कृष्ण ने विविध प्रकार के क्रीड़ा-विलास किये हैं।

06

भानुगढ़

बरसाने में भानुगढ़ पर ही श्री राधा रानी जी का मन्दिर स्थित है। इसे वृषभानु जी का भवन कहते हैं। मन्दिर अत्यंत सुन्दर, कलात्मक बना हुआ है। राधाष्टमी पर यहाँ विशेष दर्शन होते हैं।

07

मोरकुटी

यहाँ श्री राधा जी मयूरों को नृत्य सिखाती थीं। कभी-कभी श्याम सुन्दर भी मोर का रूप धारण कर वहाँ पहुँच जाते और राधा रानी से नृत्य सीखते। श्याम सुन्दर जान बूझ कर गलतियाँ करते और राधा जी उनको डाँटती थीं।

नाचत मोर संग स्याम, मुदित श्यामाहि रिझावत।
श्री हरिदास के स्वामी श्यामा रीझ श्याम हँसि कण्ठ लगावत ॥
08

गहवर वन

इस सघन वन को स्वयं श्री राधा रानी जी ने सुशोभित किया। यह श्री राधा जी एवं सखियों का नित्य विहार स्थल है। यहाँ श्री राधा-सरोवर, रास मण्डल, शंख का चिह्न और गाय के स्तन का चिह्न दर्शनीय है। रास मण्डल के पास मयूर सरोवर है। यहाँ महाप्रभु श्री बल्लभाचार्य जी की बैठक भी है।

09

कृष्ण कुण्ड

चारों ओर से लता-पताओं, वृक्षों से घिरा हुआ यह सरोवर गहवर वन की शोभा है। पिया-प्रियतम ने यहाँ जल केलि आदि लीलाएं की हैं।

10

चिकसौली

श्रीराधा जी की अष्ट सखियों में अत्यंत प्रिय चित्रा सखी का जन्म स्थान है। चित्रा सखी श्री राधा जी के नाना प्रकार के श्रंगार करने में दक्ष, चित्रकला में योग्य थीं।

11

दोहनी कुण्ड

गहवर वन के समीप चिकसौली गाँव में। यहाँ वृषभानु जी की लाखों गाय रहती थीं। एक बार राधा जी गाय का दूध दोह रही थीं कि श्रीकृष्ण आकर ठिठोली करने लगे और दूध की धार राधा जी के मुख पर मार दी।

आमें सामें बैठ दोऊ दोहत करत ठिठोर, दूध धार मुखपर पडत दृग भये चन्द्र चकोर।
12

पीलीपोखर

बरसाना की उत्तर दिशा में। पीलू के वृक्षों से घिरा वन। माना जाता है श्री राधा जी ने विवाह के पश्चात हल्दी से लिपे हाथ धोये थे जिससे सारा जल पीला हो गया। अतः नाम पड़ा पीली पोखर।

13

ऊँचा गाँव

श्री राधा जी की अष्ट सखियों में सबसे प्रधान श्री ललिता सखी जी का गाँव है। श्रीराधाजी को अमित सुख प्रदान कराने वाली ललिता सखी प्रिया-प्रियतम की विविध लीलाओं में सहगामी हैं। स्वयं भोलेनाथ शंकर जी ने भी गोपी भाव की दीक्षा इन्हीं से ली थी।

14

चित्र-विचित्र शिला

सखियों ने प्रिया-प्रियतम का श्रंगार किया तथा ललिता जी के साथ श्री श्याम सुन्दर के विवाह का आयोजन किया। उनके मेहंदी रचे कर-कमल इस शिला पर टिके थे, जिसके चिह्न आज भी दर्शनीय हैं।

15

रीठौरा

श्री वृषभान जी के ज्येष्ठ भाता श्री चन्द्रभानु गोपजी का गाँव। इन्हीं की लाडिली बेटी श्री चन्द्रावली जी हैं। ये श्री कृष्ण जी की अनन्य प्रिया सखी हैं। यहाँ चन्द्रावली सरोवर तथा श्री विठ्ठलनाथ जी की बैठक है।

16

डभारो

यह श्री तुंगविद्या सखी जी का जन्मस्थल है।

17

संकेतवन

बरसाना और नंदगाँव के बीच में। श्री राधा जी जावट से और श्री कृष्ण नंदगाँव से आकर यहाँ मिलते थे। वृन्दा देवी, वीरा देवी और सुबल सखा संकेत के द्वारा मिलन कराते थे। यहाँ संकेत बिहारी जी का मन्दिर, रास मण्डल, झूला मण्डप दर्शनीय हैं।

अन्य दर्शनीय स्थल

वृषभानु सरोवर, कीर्तिदा सरोवर, श्रीराधा सरोवर, ब्रजेश्वर महादेव, शूरसरोवर, मयूर सरोवर, त्रिवेणी स्थल, सखी कूप, बल्देव स्थल आदि

जय जय बरसानों गाँव जहाँ राधारानी राज रही।
पर्वत ऊपर महल मणिन कौ, जागे आगे त्रिभुवन फीकौ।
ब्रह्मा रूप धरै पर्वत कौ। श्री चरनन कौ धाम, जहाँ राधारानी राज रही ॥
जय श्री राधे 🌸

वृन्दावन सौ वन नहीं, नन्दगाँव सौ गाँव।
बंशीबट सौ बट नहीं, कृष्ण नाम सौ नाम ॥

नन्दगाँव

श्री नन्दराय जी एवं श्री कृष्ण-बलराम की लीला भूमि

नन्दगाँव श्री नन्दराय जी एवं उनके पूर्वजों की निवास स्थली रही है। किन्हीं कारणवश वे बाद में गोकुल जाकर बस गये। जिस समय श्री कृष्ण भगवान का प्रादुर्भाव हुआ उस समय नन्दराय जी गोकुल में ही रहते थे।

गोकुल से नन्दगाँव आगमन

श्री नन्दराय जी गोकुल में कंस द्वारा भेजे गये असुरों से भयभीत होकर अपने लाला श्रीकृष्ण-बलराम एवं अन्य गोप समूह, समस्त गौधन को साथ लेकर श्री यमुनाजी के रमणीय तटवर्ती स्थल वृन्दावन होते हुए नन्दगाँव आकर रहने लगे।

श्रीमद्भागवत के अनुसार ब्रज के दो भाग

1. वृहदवन

महावन, मधुवन, तालवन, भद्रवन, कुमुदवन आदि

2. वृन्दावन

गोवर्धन, बरसाना, नन्दगाँव आदि

अतः नन्दगाँव भी वृन्दावन के अन्तर्गत आता है। यहाँ की रमणीय स्थलियाँ, सघन वृक्षावली, मनोरम कुण्ड तथा गोचर भूमि सभी के मन को सहज लुभाती हैं।

श्री शिव जी की प्रार्थना

श्री महादेव जी ने माता यशोदा से प्रार्थना की "हे ब्रजरानी! वृन्दावन में मैं पर्वत रूप में विराजमान हूँ। आप जब गोकुल छोड़कर वृन्दावन आयें तो आप नन्दराय जी तथा श्री कृष्ण-बलराम के साथ मेरी पीठ पर आकर निवास करें।"

श्री शिव विग्रहरूप पर्वत पर श्री नन्दमहाराज अपने भाईयों उपनन्द, प्रतिनन्द, अभिनन्द और सुनन्द के साथ आकर यहाँ निवास करने लगे थे। यहीं स्थान ब्रज में आज नन्दगाँव के नाम से प्रसिद्ध है।

श्री कृष्ण जी ने यहाँ अपनी अनेक बाल लीलायें संपन्न की हैं। नन्दबाबा का महल, नन्द भवन और सम्पूर्ण गाँव कृष्ण की बाल लीलाओं का साक्षी है।

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ब्रज के चार धाम

ब्रज चौरासी कोस में, चार धाम निज धाम।
वृन्दावन अरु मधुपुरी बरसाना नंदगाँव ॥

जय श्री नन्द नन्दन की 🌸

नन्दगाँव के दर्शनीय स्थल

जहाँ कन्हैया ने बाल लीलाएं कीं

01

नन्दभवन

यह नन्दगाँव का प्रमुख मन्दिर है। यह नन्दीश्वर पर्वत पर स्थित है। इसमें नन्दबाबा, माँ यशोदा, रोहिणी एवं श्री कृष्ण-बल्देव के साथ विराजमान हैं। यहाँ सबके अलग-अलग शयन कक्ष हैं।

यहीं पर श्री कृष्ण-बलराम ने अपनी बाल एवं किशोर अवस्था तक की बहुत सी लीलायें की हैं।

02

नन्दकुण्ड

नन्दभवन से थोड़ी दूर दक्षिण में नन्द कुण्ड है। महाराज नन्द प्रातः काल यहाँ स्नान, संध्या वंदन आदि करते थे। कभी-कभी कृष्ण और बलराम को अपने कन्धों पर बिठाकर लाते और उन्हें भी यहाँ स्नान कराते थे।

कुण्ड के तट पर स्थित मन्दिर में नन्दबाबा की गोद में बैठे हुए श्री कृष्ण एवं बलराम जी के मनोहर दर्शन हैं।

03

नन्दबैठक

ब्रजेश्वर महाराज नन्दराय जी यहाँ अपने सभी परिजनों, वृद्ध गोपों तथा पुरोहित आदि के साथ समय समय पर बैठकर श्री कृष्ण-बलराम के कल्याण के लिए परामर्श किया करते थे।

04

यशोदा कुण्ड

मैया यशोदा प्रतिदिन यहाँ स्नान करने आतीं थीं। माँ यशोदा के साथ कभी-कभी कृष्ण-बलराम भी स्नान करने आ जाते थे और उन दोनों की जल क्रीडाएं देखकर यशोदा जी बहुत प्रसन्न होती थीं।

कुण्ड के तट पर नृसिंह जी का मन्दिर है, जहाँ वह नित्य नृसिंह देव से लाला कन्हैया के कुशल मंगल की प्रार्थना करती थीं। इसी के पास ही एक प्राचीन गुफा है जिसमें अनेक संत महात्माओं ने तप किया।

05

हाऊ-विलाऊ

यशोदा कुण्ड के पश्चिम तट पर सखाओं के साथ कृष्णजी की बाल लीलाओं का यह स्थान है। यहाँ श्री कृष्ण-बलराम सखाओं के साथ खेलने आया करते थे और खेलने में इतने तनमय हो जाते कि उन्हें भोजन करने का भी स्मरण नहीं रहता।

मैया यशोदा कहती - "लाला! जल्दी आजा हऊआ आ जायेगौ।" तो कन्हैया डर कर मैया की गोद में आ जाया करते।

"दूर खेलन मत जाओ लाल यहाँ हाऊ आये हैं, हँस कर पूछत कान्ह मैया यह किनै पठाये हैं।"
06

चरण पहाड़ी

नन्दगाँव के पश्चिम में चरण पहाडी स्थित है। श्री कृष्ण ने यहाँ लाखों गायों को एकत्रित करने के लिए गौचारण के समय इस पहाड़ी पर बंशी वादन किया था। श्री कृष्ण जी की मधुर बंशी को सुनकर यह पहाडी पिघल गयी तथा कृष्ण के चरण चिह्न यहाँ पर बन गये।

07

वृन्दा देवी

चरण पहाड़ी से थोड़ी ही दूर वृन्दा देवी का मन्दिर है। श्री कृष्ण की प्रकट लीला के समय वृन्दा देवी यहाँ निवास किया करती थीं। यहीं से वे संकेत आदि कुंजों में श्री राधा-कृष्ण का मिलन करातीं थीं।

वृन्दा देवी ही श्रीराधा-कृष्ण की लीलाओं की अधिष्ठात्री वन देवी हैं। वृन्दा देवी की कृपा से ही श्री राधा-कृष्ण की लीलाओं में प्रवेश लिया जा सकता है।

08

गहवर वन

इस सघन वन को स्वयं श्री राधा रानी जी ने सुशोभित किया। यह श्री राधा जी एवं अन्य सखियों का नित्य विहार स्थल है। यहाँ श्री राधा-सरोवर, रास मण्डल, शंख का चिह्न और गाय के स्तन का चिह्न दर्शनीय है। रास मण्डल के पास मयूर सरोवर है। यहाँ महाप्रभु श्री बल्लभाचार्य जी की बैठक भी है।

09

सावन सरोवर

यह सरोवर नंदगाँव से काम्यवन जाने वाले रास्ते पर स्थित है। इस सरोवर का निर्माण विशाखा सखी के पिता पावन गोप ने किया था, इसीलिए इसका नाम पावन सरोवर है। सखाओं के साथ गोचारण से लौटते समय कृष्ण जी अपनी गायों को इस सरोवर में पानी पिलाते थे।

10

धोवनी कुण्ड

पावन सरोवर के पास ही यह कुण्ड स्थित है। इस कुण्ड में दूध-दही के बर्तन धोये जाते थे इसीलिए इसका नाम धोवनी कुण्ड पड़ गया।

11

मुक्ता कुण्ड

जब वृषभानु जी राधा जी की सगाई श्री कृष्ण जी के साथ करने नन्दगाँव पहुंचे तो साथ में मोती आदि लाये। नन्दराय जी एवं यशोदा जी चिन्तित हुईं कि बदले में क्या भेजें।

श्री कृष्ण जी ने माँ यशोदा की चिन्ता दूर करने के लिये यहीं पर रत्नों की खेती की और यहाँ नाना प्रकार के रत्न उग आये थे।

12

ललिता कुण्ड

यह वह स्थान है जहाँ ललिता सखी जी श्रीराधा रानी को किसी न किसी बहाने से बुलाकर श्रीश्याम सुन्दर से मिलाया करती थीं।

13

टेर कदम्ब

नन्दगाँव एवं जावट ग्राम के बीच में स्थित। जब श्रीकृष्ण जी गोचारण कराने जाते थे, तो कदम्ब वृक्ष के ऊपर बैठकर मधुर बंशी बजाकर अपनी गायों को टेरते थे - अर्थात पुकारते थे।

सभी गाय कन्हैया की बंशी सुनकर यहाँ एकत्र हो जाती थीं। आज भी गोपाष्टमी के दिन नन्दगाँव के गोस्वामी परम्परागत इस उत्सव को मनाते हैं।

14

आसेश्वर महादेव

यहाँ आसेश्वर महादेव का मन्दिर है।

जय श्री नन्द नन्दन की 🌸

काम्यवन

ब्रज के बारह वनों में से एक उत्तम वन - वर्तमान नाम कामां

काम्यवन ब्रज के बारह वनों में से एक उत्तम वन है। काम्यवन के आस-पास के क्षेत्र में तुलसी जी की प्रचुरता के कारण इसे आदि वृन्दावन भी कहा जाता है। वृन्दा तुलसी जी का ही पर्याय है।

श्री वृन्दावन की सीमा

श्रीवृन्दावन की सीमा का विस्तार दूर-दूर तक फैला हुआ था, श्री गिरिराज, बरसाना, नन्दगाँव आदि स्थलियाँ श्री वृन्दावन की सीमा के अन्तर्गत ही मानी गयीं।

महाभारत से सम्बंध

महाभारत में वर्णित काम्यवन भी यही माना गया है। पाण्डवों ने यहाँ अज्ञातवास किया था।

वर्तमान में यहाँ अनेक ऐसे स्थल मौजूद हैं जिससे इसे महाभारत से सम्बन्धित माना जा सकता है। पाँचों पाण्डवों की मूर्तियाँ, धर्मराज युधिष्ठिर के नाम से धर्मकूप तथा धर्मकुण्ड भी यहाँ प्रसिद्ध है।

📍 स्थान: यह स्थल राजस्थान राज्य के भरतपुर जिले के अन्तर्गत आता है। इसका वर्तमान नाम कामां है।

विष्णु पुराण के अनुसार

विष्णु पुराण के अनुसार यहाँ छोटे-बड़े असंख्य तीर्थ हैं। 84 तीर्थ, 84 मन्दिर, 84 खम्भे आदि राजा कामसेन ने बनवाये थे, जो यहाँ कि अमूल्य धरोहर हैं।

काम्यवन के प्रमुख मन्दिर

🔱 कामेश्वर महादेव

💙 श्री गोपीनाथ जी

🌙 श्रीगोकल चंद्रमा जी

💗 श्री राधावल्लभ जी

🪈 श्री मदन मोहन जी

🌿 श्री वृन्दा देवी

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🚪 सप्तद्वारों के लिए प्रसिद्ध

कामवन को सप्तद्वारों के लिये भी जाना जाता है। यद्यपि अनुरक्षण के अभाव में यहाँ के अनेक तीर्थ नष्ट भी होते जा रहे हैं फिर भी कुछ तीर्थ आज भी अपना गौरव और श्रीकृष्ण लीलाओं को दर्शाते हैं।

जय आदि वृन्दावन काम्यवन की 🌸

काम्यवन में दर्शनीय स्थल

84 तीर्थों वाला आदि वृन्दावन

01

विमल कुण्ड

चंपक नगरी के राजा विमल की छः हजार रानियों ने श्री याज्ञवल्य ऋषि की कृपा से कन्याओं को जन्म दिया। इन सभी की पूर्व जन्म की अभिलाषा श्री राम चन्द्र जी से विवाह करने की थी।

भगवान श्री कृष्ण इन सभी राजकन्याओं को ब्रजमण्डल के कामवन ले आये और उतने ही रूप धारण कर रासलीला की। इन विमलकुमारियों के आनन्द अश्रुओं से प्रपूरित यह कुण्ड विमल कुण्ड कहलाया।

फल: इस कुण्ड में स्नान से पुष्करराज में सात बार स्नान का फल मिलता है।

आसपास: दाऊजी, सूर्यदेव, नीलकंठ महादेव, गोवर्धन नाथ, मदन मोहन, कामवन बिहारी, विमला देवी, मुरली मनोहर, गंगा जी, गोपाल जी। चार धाम भी यहाँ अवस्थित हैं।

02

चरणकुण्ड

श्रीप्रिया-प्रियतम जी सहस ही यहाँ आकर बैठ गये और अपने श्री चरणों से जल उलीझते रहे। तभी से यह स्थली ठाकुर जी के श्री चरणों की रज से अभिसिंचित होने के कारण चरण कुण्ड कहलायी।

पास में: वैद्यनाथ महादेव, विष्णु सिंहासन, गरुड़ जी, चन्द्रेश्वर महादेव, बारह कूप, यन कुण्ड

03

धर्म कुण्ड

श्री नारायण भगवान स्वयं धर्म रूप में यहाँ विराजते हैं तथा धर्म का प्रतिपादन करते हैं। यह तीर्थ अत्यंत शोभायमान है। भाद्रपद कृष्णाष्टमी को यहाँ स्नान का विशेष महत्व है।

पास में: नर-नारायण कुण्ड, पंच पाण्डव कुण्ड, नील बराह, श्री हनुमान जी

04

मणिकर्णिका

इस स्थान पर विश्वनाथ भगवान श्री शंकर जी विराजमान हैं।

05

सेतुबन्ध कुण्ड

श्री कृष्ण ने यहाँ श्री राम के आवेश में गोपियों के कहने पर बन्दरों के द्वारा सेतु का निर्माण किया था। अभी भी इस सरोवर में सेतु बन्ध के भग्नावशेष दर्शनीय हैं।

उत्तर: रामेश्वर महादेव जी - श्री कृष्ण द्वारा प्रतिष्ठित। दक्षिण: टीले के रूप में लंका पुरी

06

गयाकुण्ड

गया तीर्थ भी ब्रज मण्डल के इस स्थान पर रहकर कृष्ण जी की अराधना करते हैं। इसमें अगस्त कुण्ड भी मिला हुआ है। गया कुण्ड के दक्षिणी घाट का नाम अगस्त घाट है।

07

लुकलुक कुण्ड

गोचारण करते समय श्री कृष्ण सखाओं को छोड़कर यहाँ गोपियों से मिले और लुका छिपी की क्रीड़ा की। श्री कृष्ण पर्वत की कन्दरा में छिप गये - लुक-लुक गुफा

जहाँ सखियाँ ध्यान कर रही थीं वह ध्यान कुण्ड कहलाता है।

08

चरण पहाड़ी

श्री कृष्ण लुकलुक गुफा से निकलकर पहाड़ी पर प्रकट होकर बंशी बजाने लगे। बंशी की धुन सुनकर पर्वत पिघल गया और उसमें श्री कृष्ण, गाय, बछड़ों, सखाओं के चरण चिह्न अंकित हो गये जो आज पाँच हजार वर्ष बाद भी स्पष्ट हैं।

09

विहल कुण्ड

चरण पहाड़ी के पास। श्रीकृष्ण की मुरली धुन को सुनकर सखियाँ प्रेम में विहल हो गयीं थीं। इसीलिए यह विहल कुण्ड कहलाया।

पंच सखा कुण्ड: रंगीला, उबीला, जकीला, मटीला और दतीला कुण्ड

10

फिसलनी शिला

कलावता ग्राम के पास इन्द्रसेन पर्वत पर। गोचारण के समय श्री कृष्ण सखाओं के साथ फिसलने की क्रीड़ा करते थे। कभी कभी श्री राधा जी भी सखियों के साथ यहाँ लीलाएं करती थीं।

11

व्योमासुर गुफा

श्री कृष्ण जी ने यहीं कंस के द्वारा भेजे गये व्योमासुर का वध किया था। वध के समय पृथ्वी काँपी तो बल्देव जी ने चरणों से पृथ्वी को दबाकर शांत किया। उनके चरण चिह्न आज भी हैं।

मेधावी मुनि की कन्दरा भी कहते हैं क्योंकि मुनि ने यहाँ कृष्ण की अराधना की थी।

12

भोजन थाली

व्योमासुर का वध करके श्री कृष्ण जी ने सखाओं के साथ यहाँ भोजन किया था। थाली, कटोरा आदि के चिह्न अभी भी विद्यमान हैं। यहीं कृष्ण कुण्ड और बाजन शिला दर्शनीय है। श्री शंकराचार्य जी को कृष्ण जी की ग्वाल गोष्टी का दर्शन यहीं हुआ था।

13

काम सरोवर

ब्रज गोपिकाओं के सभी कार्य श्यामसुन्दर को रिझाने के लिए थे। इस सरोवर में स्नान करने से सभी मनोकामना पूर्ण होती हैं।

14

गोकुल चंद्रमाजी

यह विग्रह महावन की एक क्षत्राणि को यमुना महारानी की रज में प्राप्त हुआ था। श्रीमहाप्रभु बल्लभाचार्य जी ने सेवा का अधिकार श्रीनारायण दास ब्रह्मचारी को दिया।

वल्लभकुल सम्प्रदाय के पंचम पीठ का प्रमुख स्थान एवं गद्दी स्थान है।

15

सामरी खेरा

श्री कृष्ण की प्रिय सखी सामरी सखी का गाँव है। यहाँ गोपाल कुण्ड, सूर्य कुण्ड, गोपाल मन्दिर तथा बिहारी जी का मन्दिर है।

16

आदिबद्री

चारों ओर वृक्षों और पर्वतों से घिरा रमणीय स्थल। यह ब्रज का उत्तराखंड कहलाता है। यहाँ बद्रीनाथ धाम, तृप्ति कुण्ड, यमुनोत्री, गंगोत्री, लक्ष्मण झूला, बूढ़े बद्री, हरिद्वार, हर की पौड़ी स्थित हैं।

17

केदारनाथ

श्वेत पर्वत पर शिवजी एवं पार्वती जी युगल रूप में विराज रहे हैं। यह ब्रज का केदारनाथ है। पर्वत के नीचे गौरी कुण्ड है।

जय श्री काम्यवन बिहारी की 🌸

कृष्ण जिनका नाम है गोकुल जिनका धाम है।
ऐसे श्री भगवान को बारम्बार प्रणाम है॥

गोकुल - महावन

श्री कृष्ण-बलराम की बाल लीला भूमि

📍 स्थान: मथुरा से 15 किमी की दूरी पर श्रीयमुनाजी के पार स्थित। यह ब्रज का बड़ा ही महत्वपूर्ण स्थल है।

श्री बलराम जी का प्राकट्य

यहीं रोहिणी जी ने श्री बलराम जी को जन्म दिया। बलराम जी देवकी जी के सातवे गर्भ में थे जिन्हें योगमाया ने कर्षित कर रोहिणी के गर्भ में डाल दिया था।

श्री कृष्ण का गोकुल आगमन

मथुरा में कृष्ण जी के जन्म के पश्चात् कंस के सभी सैनिकों को निद्रा आ गयी थी एवं वासुदेव जी की बेडियाँ खुल गयी थीं। तब वासुदेव जी श्री कृष्ण को गोकुल में नन्दराय जी के यहाँ छोड़ आये।

श्री नन्दराय जी के घर लाला का जन्म हुआ है - धीरे धीरे यह बात समस्त गोकुल में फैल गयी। सभी गोपगण, गोपियाँ, गोकुलवासी खुशियाँ मनाने लगे। सभी घर, गलियाँ चौक आदि सजाये गये एवं बधाइयाँ गायी जाने लगीं।

श्री कृष्ण-बलराम की बाल लीलाएं

श्री कृष्ण और बलराम जी का पालन पोषण यही हुआ एवं दोनों अपनी लीलाओं से सभी को मुग्ध करते रहे।

  • जहाँ घुटनों के बल चलते हुए दोनों भाई को देखना गोकुलवासियों को सुख देता था
  • वहीं माखन चुराकर श्री कृष्ण जी ब्रजगोपिकाओं के दुखों को हर लेते थे
  • गोपियाँ कृष्ण जी को छाछ का लालच देकर नचाती थीं
  • कृष्ण जी बांसुरी की धुन से सभी को मंत्र मुग्ध कर देते थे

असुरों का वध

भगवान श्री कृष्ण ने गोकुल में रहते हुए पूतना, शकटासुर, तृणावर्त आदि असुरों को मोक्ष प्रदान किया।

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महावन

गोकुल से आगे 2 किमी दूर महावन स्थित है। बहुत लोग इसे पुरानी गोकुल मानते हैं।

महावन के प्रमुख मन्दिर:

🏛️ चौरासी खम्भों का मन्दिर 🔱 नन्देश्वर महादेव 👑 मथुरानाथ 🌊 द्वारिकानाथ
जय श्री गोकुल नन्दन की 🌸

गोकुल में दर्शनीय स्थल

ब्रज की पंच पावन लीलास्थलियाँ

01

रावल

"ब्रज में सुन्दर रावल ग्रामा, जहाँ प्रकटि प्रिय पूर्व कामा"

यह स्थल श्री राधा जी की ननसार है। राधा जी के पिता श्री वृषभानु जी महाराज यहाँ पूर्व में निवास करते थे।

यहीं श्री राधिका जू का जन्म हुआ। बाद में उनकी माता कीर्ति के कहने पर वृषभानु जी बरसाना ले गये।

राधाष्टमी पर यहाँ राधा रानी का जन्मोत्सव धूम धाम से मनाया जाता है।

02

दाऊजी

बल्देव को ही दाऊजी का गाँव कहा जाता है। इसका पुराना नाम रीढ़ा गाँव है। शेषावतार बलराम जी श्रीकृष्ण के बड़े भाई हैं। इन्हें ब्रज का राजा कहा जाता है।

दर्शनीय: श्री बलदेव जी का मन्दिर, दान बिहारी जी का मन्दिर, रेवती कुण्ड और क्षीर सागर

03

ब्रह्माण्ड घाट

यह वही स्थल है जहाँ कृष्ण जी ने माटी खायी थी। ग्वाल वालों ने यशोदा मैया से शिकायत की। मैया ने लाला को डांटा और पूछा - "लाला तैने माटी खायी है?"

लाला बोले "मैया मैंने माटी नाय खायी"। मैया ने कहा "अपनौ मुँह खोल के दिखा"। जैसे ही कृष्णजी ने मुँह खोला तो यशोदा माँ को उनके मुख में ब्रह्माण्ड, सारा ब्रज, सारा गोकुल, नन्दबाबा, सभी ग्वालवाल एवं स्वयं के दर्शन हुए।

श्री कृष्ण जी ने यशोदा माँ को विराट रूप के दर्शन कराये। मैया मूर्छित हो गयीं। फिर लाला ने माया का पर्दा डाल दिया। अतः नाम पड़ा ब्रह्माण्ड घाट। यह ब्रज धाम का स्वर्ग कहलाता है।

04

रमणरेती

गोकुल - महावन के मध्य यमुना किनारे स्थित रमणीक स्थान। यहाँ रमण बिहारी जी का मन्दिर है।

यह रसखान की तप स्थली रही है, उनकी यहाँ समाधि भी है। ठाकुर जी ने यहाँ ग्वाल वालों के साथ लीलाएं की हैं एवं यहाँ की रज में लोट-पोट हुए हैं।

"बालू रेती में लोट-पोट होए यशोदा मैया तेरौ ललना"
05

लोहवन

मथुरा-गोकुल मार्ग पर स्थित वन। श्री कृष्ण ने यहीं गोचारण करते समय लोहजंघासुर का वध किया था। इसीलिए नाम पड़ा लोहवन

दर्शनीय: कृष्ण कुण्ड, लोहासुर की गुफा तथा श्री गोपीनाथ जी का दर्शन

जय श्री ब्रजधाम की 🌸

अन्य दर्शनीय स्थल

ब्रज के छुपे हुए रत्न - जहाँ हर कण में लीला बसी है

01

बहुलावन

ब्रज के बारह वनों में से एक। श्री हरि की बहला नाम की पत्नी हमेशा यहाँ विराजमान रहती हैं।

बहुलावनकुण्ड के पद्मवन में स्नान-पान से बहुत पुण्य। भगवान विष्णु लक्ष्मी सहित यहाँ निवास करते हैं। यहाँ बहुला गाय और शेर की सत्यव्रत की कथा प्रसिद्ध है।

दर्शनीय: बलराम कुण्ड, मानसरोवर कुण्ड

02

तोषग्राम

श्री कृष्ण के प्रिय सखा तोष का गाँव। तोष नृत्यकला में निपुण थे। श्री कृष्ण जी ने नृत्य की शिक्षा इन्हीं से प्राप्त की थी।

दर्शनीय: तोष कुण्ड - जल पीकर ग्वालबाल, गौएँ, कृष्ण-बलराम को संतोष। गोपालजी, राधारमण जी की स्थली

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दतिहा

यहाँ श्री कृष्ण जी ने दन्तवक्र नामक असुर का वध किया था।

दर्शनीय: महादेव जी का चतुर्भुज विग्रह

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गरुड़ गोविन्द

छटीकरा के पास। श्री कृष्ण ने श्रीदाम सखा को गरुड़ बनाकर पीठ पर बैठे - जैसे लक्ष्मीपति नारायण गरुड़ पर सवार हों।

यहाँ गरुड़ बने श्रीदाम तथा गोविन्द जी का दर्शन होता है।

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जसुमती

श्रीराधाकुण्ड-वृन्दावन मार्ग पर। श्री कृष्ण की सखी जसुमती ने यहाँ सूर्य भगवान की उपासना की थी।

दर्शनीय: सूर्य कुण्ड

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बसोंति

श्री कृष्ण की सखी बसुमति का स्थान। उसने बसंत पंचमी को भगवान की अराधना की थी।

दर्शनीय: बसन्त कुण्ड, कदम्ब खण्डी

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ऐंचादाऊजी

बलराम जी द्वारिका से ब्रज आये और महारास की इच्छा हुई। यमुना जी नहीं आईं तो बलराम जी ने हल से यमुना जी को खींचकर लाया। तभी से यमुना उल्टी बहती हैं।

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अक्षय वट

महारास देखने के लिए सभी देवता इसी वृक्ष पर विराजमान होते हैं। यह कृष्णकालीन है और सदैव हरा भरा रहता है। इसे भाण्डीरवट भी कहते हैं।

यहाँ बल्देव जी ने प्रलम्बासुर का वध किया था।

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चीरघाट

मार्गशीर्ष में गोपियाँ कात्यायनी व्रत कर यमुना में स्नान करती थीं। कृष्ण जी ने वस्त्र हरण कर शिक्षा दी - नदी में निर्वस्त्र स्नान से वरुण देवता का अपमान होता है।

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भाण्डीरवन

नन्दबाबा कन्हैया को लेकर जा रहे थे, अंधेरा हुआ तो श्रीराधा जी प्रकट हुईं। बाबा ने लाला को श्री जी की गोदी में दिया। ब्रह्मा जी ने यहाँ राधा-कृष्ण का विवाह सम्पन्न कराया।

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मांट गाँव

मांट = दधि मंथन के पात्र। मटका निर्माण का केन्द्र था। यमुना किनारे स्थित मांटवन ब्रज का प्रमुख सघन वन था।

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मानसरोवर

श्री राधा रानी कृष्ण जी से रूठ कर यहाँ विराजी थीं। यहाँ उनके नेत्रों के ही दर्शन होते हैं।

दो कुण्ड: मान कुण्ड - राधा जी के अश्रुओं से, कृष्ण कुण्ड। श्री हित हरिवंश जी को प्रिय स्थल

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कुश स्थली

नन्दराय जी की कोष स्थली। इसी को ब्रज की द्वारिका पुरी कहते हैं।

दर्शनीय: रत्नाकर सागर, माया कुण्ड, गोमती कुण्ड

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बेलवन

श्रीलक्ष्मी जी महारास देखने की अभिलाषा से यहाँ तपस्या कर रही हैं। पौष मास के प्रत्येक गुरुवार को मेला लगता है।

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फालेन

भक्त प्रह्लाद की जन्मस्थली है।

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कामई

अष्ट सखियों में प्रमुख विशाखा सखी जी का जन्मस्थान है।

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खेलनवन

गोचारण के समय श्री कृष्ण-बलराम सखाओं के साथ खेलते थे। श्री राधा जी भी सखियों के साथ यहाँ खेलने आती थीं। इसी से नाम खेलनवन पड़ा।

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बिहारवन

यहाँ रासबिहारी श्री कृष्ण ने राधिका जी सहित गोपियों के साथ रासविहार किया। यमुना जी के पास सघन रमणीय वन। यहाँ कृष्णकालीन गौवंश के दर्शन होते हैं।

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कोकिलावन

श्री कृष्ण ने कोयल के स्वर में कूह-कूह की ध्वनि से वन गुंजाया। राधा जी विशाखा के साथ मिलन के लिए यहाँ आईं। राधा-कृष्ण के मिलन की भूमि।

दर्शनीय: शनि देव जी का मन्दिर

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खादिरवन

ब्रज के 12 वनों में से एक। खजूर के बहुत वृक्ष। कृष्ण गोचारण के समय सखाओं के साथ पके खजूर खाते थे।

यहाँ श्री कृष्ण जी ने वकासुर का वध किया था।

जय श्री ब्रज के कण-कण की 🌸